# **क्या चंपावत के शाकाहारियों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं? : सार्वजनिक स्थानों पर मांसाहारी दुकानों के लिए संतुलित नीति की आवश्यकता**
नंदू पाण्डेय, प्रधान संपादक, ग्रामीण सरोकार, चंपावत
उत्तराखंड का चंपावत अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वच्छ वातावरण, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। पूर्णागिरि धाम, मां बाराही मंदिर, गोलू देवता की परंपरा और हिमालयी संस्कृति के कारण यह जिला केवल स्थानीय लोगों का ही नहीं, बल्कि देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों का भी प्रमुख केंद्र है। ऐसे नगर की पहचान स्वच्छता, अनुशासन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता से होनी चाहिए। किंतु पिछले कुछ वर्षों में नगर के मुख्य बाजारों और प्रमुख सड़कों पर खुलेआम संचालित मांसाहार की दुकानों ने एक ऐसी समस्या को जन्म दिया है, जिस पर प्रशासन और स्थानीय निकायों का ध्यान अपेक्षित गंभीरता से नहीं गया है।
यह विषय किसी के भोजन की स्वतंत्रता का विरोध नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन उसी संविधान की भावना प्रत्येक नागरिक के सम्मान, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन की भी रक्षा करती है। यदि किसी व्यक्ति की भोजन संबंधी स्वतंत्रता के कारण दूसरे नागरिक को सार्वजनिक सड़क पर चलते समय सांस लेने में कठिनाई हो, तीव्र दुर्गंध का सामना करना पड़े या उसे मानसिक रूप से अप्रिय अनुभव हो, तो यह केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों का विषय बन जाता है।
चंपावत के मुख्य बाजारों से गुजरने वाले अनेक नागरिक अनुभव करते हैं कि सड़क किनारे स्थित कुछ मांसाहार की दुकानों से उठने वाली तीव्र गंध पूरे क्षेत्र में फैल जाती है। गर्मी के मौसम में यह स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। दुकानों के बाहर खुले में लटका मांस, सफाई के दौरान निकलने वाला अपशिष्ट और पकाए जा रहे भोजन की गंध कई बार पूरे बाजार के वातावरण को प्रभावित करती है। जो लोग जन्म से शाकाहारी हैं या जिन्हें ऐसी गंध से शारीरिक परेशानी होती है, उनके लिए यह अनुभव अत्यंत असहज हो सकता है। कई लोगों को मतली, सिरदर्द, घुटन या बेचैनी जैसी समस्याएं भी महसूस होती हैं। ऐसे नागरिकों के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं है?
यह भी समझना आवश्यक है कि समस्या केवल गंध तक सीमित नहीं है। अनेक लोगों के लिए खुले में प्रदर्शित मांस को बार-बार देखना मानसिक रूप से भी अप्रिय अनुभव होता है। धार्मिक आस्था रखने वाले श्रद्धालु, छोटे बच्चे, बुजुर्ग तथा बड़ी संख्या में शाकाहारी परिवार प्रतिदिन इन्हीं मार्गों से होकर गुजरते हैं। पर्यटन और तीर्थाटन की दृष्टि से भी किसी नगर की पहली छवि अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी धार्मिक नगर के मुख्य प्रवेश मार्गों और बाजारों में सबसे पहले ऐसी दुकानें दिखाई दें, तो इससे नगर की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन अनुभव दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार का समाधान समानता और संतुलन के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए। किसी व्यवसाय को बंद करना या किसी समुदाय विशेष को लक्ष्य बनाना न तो उचित होगा और न ही संवैधानिक। किंतु नगर नियोजन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह अपेक्षा अवश्य की जा सकती है कि ऐसे व्यवसायों के संचालन के लिए वैज्ञानिक और व्यावहारिक नियम बनाए जाएं।
देश के अनेक शहरों में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों, तेज ध्वनि करने वाले प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली गतिविधियों के लिए विशेष क्षेत्र निर्धारित किए जाते हैं। उसी प्रकार मांसाहार की दुकानों के लिए भी ऐसी स्थान-निर्धारण नीति बनाई जा सकती है जिससे वे मुख्य धार्मिक मार्गों, विद्यालयों, अस्पतालों और अत्यधिक भीड़भाड़ वाले बाजारों से कुछ दूरी पर स्थापित हों। इससे न केवल शाकाहारी नागरिकों की असुविधा कम होगी, बल्कि स्वयं व्यापारियों को भी व्यवस्थित व्यापारिक वातावरण प्राप्त होगा।
चंपावत नगर पालिका, जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग को संयुक्त रूप से इस विषय पर व्यापक नीति तैयार करनी चाहिए। दुकानों में आधुनिक कोल्ड स्टोरेज, बंद डिस्प्ले सिस्टम, प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन और नियमित स्वच्छता सुनिश्चित की जानी चाहिए। खुले में मांस लटकाने की प्रथा पर नियंत्रण लगाया जा सकता है तथा ऐसी पैकेजिंग और संरचना अपनाई जा सकती है जिससे दुर्गंध आसपास के वातावरण में न्यूनतम फैले। यदि नगर के सौंदर्यीकरण और स्वच्छता के लिए अन्य नियम लागू हो सकते हैं, तो इस दिशा में भी प्रशासनिक पहल असंगत नहीं होगी।
विशेष रूप से धार्मिक और पर्यटन नगरों के लिए अलग दिशा-निर्देश तैयार किए जाने चाहिए। चंपावत जैसे जनपद में जहां प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं, वहां नगर की सांस्कृतिक संवेदनशीलता का सम्मान भी प्रशासनिक प्राथमिकता का विषय होना चाहिए। यह केवल धार्मिक दृष्टिकोण का प्रश्न नहीं, बल्कि पर्यटन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नगर की सकारात्मक छवि से भी जुड़ा हुआ विषय है।
साथ ही नागरिकों को भी परस्पर सम्मान की भावना अपनानी होगी। जिस प्रकार शाकाहारी नागरिकों को मांसाहार करने वालों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए, उसी प्रकार मांसाहार से जुड़े व्यवसायों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका संचालन इस प्रकार हो जिससे आसपास के नागरिकों को न्यूनतम असुविधा हो। सभ्य समाज की पहचान यही है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए करे।
आज आवश्यकता किसी विवाद की नहीं, बल्कि संवाद की है। जिला प्रशासन, नगर पालिका, व्यापारी संगठन, नागरिक मंच, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और विभिन्न सामाजिक संगठनों को एक साथ बैठकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो। यदि मुख्य बाजारों के बजाय उपयुक्त व्यावसायिक क्षेत्रों में ऐसी दुकानों का चरणबद्ध पुनर्स्थापन, बेहतर स्वच्छता मानक और गंध नियंत्रण के उपाय लागू किए जाएं, तो इससे किसी के अधिकारों का हनन भी नहीं होगा और नागरिकों की लंबे समय से चली आ रही असुविधा भी काफी हद तक दूर हो सकेगी।
अंततः प्रश्न केवल शाकाहार या मांसाहार का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या किसी भी नागरिक को सार्वजनिक सड़क पर बिना घुटन, बिना तीव्र दुर्गंध और बिना अनावश्यक मानसिक असुविधा के चलने का अधिकार है? यदि उत्तर "हाँ" है, तो चंपावत सहित देश के सभी नगरों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार संतुलित, वैज्ञानिक और संवेदनशील नियम बनाने की आवश्यकता है। एक आधुनिक, स्वच्छ और समावेशी नगर वही है जहाँ भोजन की स्वतंत्रता और स्वच्छ सार्वजनिक वातावरण—दोनों का समान सम्मान किया जाए। यही सुशासन की पहचान है और यही नागरिक अधिकारों का वास्तविक संतुलन भी।

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