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विकास की कीमत आखिर जनता ही क्यों चुकाए?

 चंपावत जिला चिकित्सालय के बाहर निर्माण कार्य बना आमजन की परेशानी का सबब नंदू पाण्डेय, संपादक, ग्रामीण सरोकार, चंपावत चंपावत जिला चिकित्सालय परिसर के समीप निर्माणाधीन मल्टी-स्टोरी पार्किंग निश्चित रूप से शहर की भविष्य की आवश्यकता है। इससे अस्पताल क्षेत्र में वर्षों से बनी पार्किंग की समस्या का समाधान होने की उम्मीद है। लेकिन किसी भी विकास कार्य का उद्देश्य यदि आम नागरिकों का जीवन आसान बनाना है, तो उसके निर्माणकाल में लोगों को न्यूनतम असुविधा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। वर्तमान स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। निर्माण कार्य के चलते अस्पताल के मुख्य मार्ग पर आए दिन लंबा जाम लग रहा है। मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में कठिनाई हो रही है, जबकि एंबुलेंस तक कई बार ट्रैफिक में फंसने की स्थिति बन जाती है। अस्पताल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसी अव्यवस्था चिंता का विषय है। धूप वाले दिनों में निर्माण सामग्री और मिट्टी से उड़ने वाली धूल राहगीरों, मरीजों और आसपास के व्यापारियों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। वहीं बारिश होते ही यही सड़क कीचड़ से लथपथ हो जाती है। पैदल चलना तो...

आधुनिक मशीनें आईं, लेकिन डॉक्टर चले गए तो इलाज कौन करेगा?

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  मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 29 जून को अपने गृह जनपद चम्पावत को लगभग 6 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक एमआरआई मशीन और 50 बेड वाले क्रिटिकल केयर सेंटर की सौगात देकर स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने का प्रयास किया है। इसके साथ ही जिले में 10 नए चिकित्सकों की तैनाती भी की गई है, जो निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम है। यह मुख्यमंत्री के उस संकल्प का हिस्सा है, जिसके तहत चम्पावत को एक मॉडल जिला बनाने की परिकल्पना की गई है। लेकिन इसी बीच स्वास्थ्य विभाग के ताजा तबादला आदेशों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकार आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिला अस्पताल चम्पावत, उप जिला चिकित्सालय टनकपुर तथा अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में वर्षों से सेवाएं दे रहे लगभग 13 चिकित्सकों का अन्य जनपदों में स्थानांतरण कर दिया गया है। इनमें सर्जन, नेत्र रोग विशेषज्ञ और कई अनुभवी चिकित्साधिकारी शामिल हैं। स्वाभाविक है कि इससे स्थानीय जनता में निराशा और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हुई है। सवाल यह नहीं है कि स्थानांतरण क्यों हुए, क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था में तबादले एक सामान्य प्रक...

# **क्या चंपावत के शाकाहारियों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं? : सार्वजनिक स्थानों पर मांसाहारी दुकानों के लिए संतुलित नीति की आवश्यकता**

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  नंदू पाण्डेय, प्रधान संपादक, ग्रामीण सरोकार, चंपावत उत्तराखंड का चंपावत अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वच्छ वातावरण, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। पूर्णागिरि धाम, मां बाराही मंदिर, गोलू देवता की परंपरा और हिमालयी संस्कृति के कारण यह जिला केवल स्थानीय लोगों का ही नहीं, बल्कि देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों का भी प्रमुख केंद्र है। ऐसे नगर की पहचान स्वच्छता, अनुशासन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता से होनी चाहिए। किंतु पिछले कुछ वर्षों में नगर के मुख्य बाजारों और प्रमुख सड़कों पर खुलेआम संचालित मांसाहार की दुकानों ने एक ऐसी समस्या को जन्म दिया है, जिस पर प्रशासन और स्थानीय निकायों का ध्यान अपेक्षित गंभीरता से नहीं गया है। यह विषय किसी के भोजन की स्वतंत्रता का विरोध नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन उसी संविधान की भावना प्रत्येक नागरिक के सम्मान, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन की भी रक्षा करती है। यदि किसी व्यक्ति की भोजन संबंधी स्वतंत्रता के कारण दूसरे नागरिक को सार्वजनिक सड़क पर चलते समय सांस लेने म...

क्या चंपावत के शाकाहारियों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं? सार्वजनिक स्थानों पर मांसाहारी दुकानों के लिए संतुलित नीति की आवश्यकता।

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क्या चंपावत के शाकाहारियों को स्वच्छ हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं?  सार्वजनिक स्थानों पर मांसाहारी दुकानों के लिए संतुलित नीति की आवश्यकता। उत्तराखंड का चंपावत अपनी प्राकृतिक सुंदरता, स्वच्छ वातावरण, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। पूर्णागिरि धाम, मां बाराही मंदिर, गोलू देवता की परंपरा और हिमालयी संस्कृति के कारण यह जिला केवल स्थानीय लोगों का ही नहीं, बल्कि देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों का भी प्रमुख केंद्र है। ऐसे नगर की पहचान स्वच्छता, अनुशासन और सांस्कृतिक संवेदनशीलता से होनी चाहिए। किंतु पिछले कुछ वर्षों में नगर के मुख्य बाजारों और प्रमुख सड़कों पर खुलेआम संचालित मांसाहार की दुकानों ने एक ऐसी समस्या को जन्म दिया है, जिस पर प्रशासन और स्थानीय निकायों का ध्यान अपेक्षित गंभीरता से नहीं गया है। यह विषय किसी के भोजन की स्वतंत्रता का विरोध नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन उसी संविधान की भावना प्रत्येक नागरिक के सम्मान, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन की भी रक्षा करती है। यदि किसी व्यक्त...

पर्यटन का विकास या जोखिम का विस्तार?

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उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक जीवन में पर्यटन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। विशेषकर सीमांत जनपदों में पर्यटन को रोजगार, स्वरोजगार और पलायन रोकने के प्रभावी साधन के रूप में देखा जा रहा है। इसी सोच के तहत चंपावत जनपद में तल्ला देश ट्रेल, बूम-खलढूंगा-चूका-टाक ट्रेल, पनार वैली ट्रेल, देवीधुरा-धूनाघाट ट्रेल तथा चल्थी-दुर्गापीपल-लधिया वैली ट्रेल सहित विभिन्न कार्बेट ट्रेल विकसित किए गए हैं। यह पहल निस्संदेह स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे न केवल स्थानीय युवाओं के लिए नए अवसर सृजित होंगे, बल्कि जनपद की ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को भी नई पहचान मिलेगी। किन्तु किसी भी विकास परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण से नहीं, बल्कि उसके सुरक्षित और सतत संचालन से तय होती है। चंपावत स्थित जिम कॉर्बेट हेरिटेज फॉरेस्ट ट्रेल आज इसी कसौटी पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह ट्रेल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित अवश्य करता है, लेकिन इसके अधिकांश हिस्सों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी चिंताजनक है। खड़ी ढलान, रेतीली एवं फिसलन भरी मिट्टी, शिलायुक्त संकरे मार्ग और अनेक स्थानो...

क्या चंपावत का नया विकास मॉडल बनेगा उत्तराखंड की नई पहचान?

नंदू पाण्डेय, चंपावत चंपावत में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कल  ₹124 करोड़ से अधिक की 17 विकास परियोजनाओं के लोकार्पण और शिलान्यास के साथ एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि सीमांत जनपद केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की विकास प्रयोगशाला भी बन सकते हैं। उनका कहना कि "चंपावत को आदर्श जिला बनाना उनके जीवन का संकल्प है", एक सामान्य राजनीतिक वक्तव्य से कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखता है। दरअसल, चंपावत आज उत्तराखंड के उन पहाड़ी जिलों का प्रतिनिधित्व करता है, जो एक ओर प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संपदा से समृद्ध हैं, तो दूसरी ओर पलायन, सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार के अभाव और आधारभूत संरचना की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि चंपावत में विकास का एक सफल मॉडल स्थापित होता है, तो यह पूरे पर्वतीय उत्तराखंड के लिए दिशा तय कर सकता है। सीएम धामी ने अपने संबोधन में बार-बार "विकास और विरासत" का उल्लेख किया। यह अवधारणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी राज्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आधुनिक विकास और सांस्कृतिक-पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संत...

सूचना का अधिकार : स्वप्रेरित प्रकटीकरण से लोकतंत्र होगा अधिक पारदर्शी - डॉ. शैलेश शुक्ला

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  भारतीय लोकतंत्र ने सूचना के अधिकार अधिनियम , 2005 के माध्यम से नागरिकों को शासन में भागीदारी का एक ऐसा संवैधानिक औजार प्रदान किया , जिसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि सरकारी सूचनाएँ सरकार की निजी संपत्ति नहीं , बल्कि जनता की धरोहर हैं। यह कानून केवल सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया निर्धारित करने वाला अधिनियम नहीं था , बल्कि शासन की संस्कृति बदलने का एक क्रांतिकारी प्रयास था। इसका उद्देश्य यह नहीं था कि प्रत्येक नागरिक अपने ही पैसे से चलने वाले सरकारी विभागों से हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए आवेदन लिखे , शुल्क जमा करे , निर्धारित समय तक प्रतीक्षा करे और आवश्यकता पड़ने पर प्रथम तथा द्वितीय अपीलों की लंबी प्रक्रिया से गुजरे। इस कानून का वास्तविक दर्शन इससे कहीं अधिक व्यापक था। इसकी मूल भावना यह थी कि सरकार स्वयं अधिकतम सूचनाएँ सार्वजनिक करे , ताकि नागरिकों को सूचना माँगने की आवश्यकता ही न्यूनतम रह जाए। दुर्भाग्य से दो दशकों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में सूचना के अधिकार की प्रक्रिया तो विकसित हुई , किंतु उसकी आत्मा आज भी प्रशासनिक फाइलों में कहीं दबकर रह गई है। सूचना माँगन...